DRS यानी डिसीजन रिव्यू सिस्टम (Decision Review System) क्रिकेट में फैसलों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए लाई गई एक तकनीक-आधारित व्यवस्था है। इसका मकसद मैदानी अंपायरों की मदद करना और उनके शुरुआती फैसले में हुई गलती को सुधारना है।
DRS का इस्तेमाल पहली बार 2008 में भारत और श्रीलंका की टेस्ट सीरीज में हुआ था। वीरेंद्र सहवाग रिव्यू सिस्टम के तहत आउट दिए जाने वाले पहले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बने। तब से ICC की देखरेख में DRS में लगातार सुधार हुए हैं। टेस्ट क्रिकेट के बाद 2011 में वनडे में DRS आया और T20 इंटरनेशनल में 2017 में।
डिसीजन रिव्यू सिस्टम क्या है?
जब कोई टीम DRS लेती है, तो वह मैदानी अंपायर के फैसले को चुनौती देती है। इसके बाद थर्ड अंपायर (टीवी अंपायर) स्लो-मोशन रीप्ले, बॉल ट्रैकिंग और एज डिटेक्शन जैसी तकनीकों की मदद से फैसले की जांच करता है।
रिव्यू लेने के लिए फील्डिंग टीम के कप्तान या आउट दिए गए बल्लेबाज को अंपायर के फैसले के 15 सेकंड के अंदर हाथों से “T” का इशारा करना होता है। समय सीमा पार होने पर अंपायर रिव्यू से इनकार कर सकता है। अगर अंपायर को लगे कि खिलाड़ी ने बाहर से (जैसे ड्रेसिंग रूम से) मदद ली है, तब भी रिव्यू खारिज हो सकता है।

इसका सबसे मशहूर उदाहरण 2017 का बेंगलुरु टेस्ट है, जब स्टीव स्मिथ ने DRS लेने से पहले ड्रेसिंग रूम की ओर देखा। तब भारतीय कप्तान विराट कोहली ने अंपायरों का ध्यान इस ओर दिलाया और अंपायरों ने स्मिथ को रिव्यू नहीं लेने दिया। बाद में स्मिथ ने इसे अपना “ब्रेन फेड” बताया।
DRS कैसे काम करता है?
DRS की प्रक्रिया में थर्ड अंपायर सबसे पहले यह देखता है कि गेंद वैध थी या नहीं, यानी गेंदबाज ने नो-बॉल तो नहीं डाली। गेंद वैध होने पर वह उस फैसले की जांच करता है जिसे चुनौती दी गई है, और साथ में आउट होने के दूसरे तरीकों पर भी नजर डालता है।
- LBW: पहले अल्ट्रा-एज और हॉटस्पॉट से देखा जाता है कि गेंद बल्ले से लगी या नहीं। अगर नहीं, तो हॉक-आई बॉल ट्रैकिंग से गेंद का संभावित रास्ता देखा जाता है। LBW का फैसला तभी पलटता है जब गेंद लाइन में पिच हुई हो, लाइन में पैड पर लगी हो और स्टंप्स से टकराती दिख रही हो।
- कैच: हॉटस्पॉट और अल्ट्रा-एज से देखा जाता है कि गेंद बल्ले से लगी या नहीं। लगी हो तो फिर कैच साफ था या नहीं, यह जांचा जाता है। अगर गेंद बल्ले की जगह पैड पर लगी हो, तो थर्ड अंपायर LBW की प्रक्रिया भी अपनाता है।
अंपायर्स कॉल क्या है?
तकनीक भी पूरी तरह परफेक्ट नहीं होती, इसलिए DRS में अंपायर्स कॉल का नियम है। हॉक-आई स्क्रीन पर जो रास्ता दिखाता है, वह गेंद के कई संभावित रास्तों में से एक अनुमान होता है। अंपायर्स कॉल का नियम मैदानी अंपायर को संदेह का लाभ देता है।
LBW के करीबी मामलों में, जैसे जब बॉल ट्रैकिंग में गेंद स्टंप्स को बस छूती दिखे, तो मैदानी अंपायर का फैसला ही बरकरार रहता है। फैसला पलटने के लिए गेंद का 50% से ज्यादा हिस्सा विकेट ज़ोन में टकराता दिखना चाहिए। अंपायर्स कॉल की वजह से फैसला न बदले तो रिव्यू लेने वाली टीम का रिव्यू खत्म नहीं होता।
एक टीम को कितने DRS मिलते हैं?
| फॉर्मेट | असफल रिव्यू की सीमा |
|---|---|
| टेस्ट | हर पारी में 3 |
| वनडे | हर पारी में 2 |
| T20 इंटरनेशनल | हर पारी में 2 |
सफल रिव्यू की कोई सीमा नहीं है। अगर रिव्यू के बाद फैसला पलट जाता है, तो टीम का रिव्यू बचा रहता है। कोविड-19 के दौर में अनुभवी न्यूट्रल अंपायरों की कमी के चलते हर फॉर्मेट में एक अतिरिक्त रिव्यू दिया गया था, जो बाद में नियमों में बना रहा।
DRS से जुड़े बड़े विवाद
DRS विवादों से अछूता नहीं रहा। 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ सचिन तेंदुलकर का LBW फैसला, 2014 के एक टेस्ट में जो रूट का कैच-बिहाइंड और 2021 में भारत के खिलाफ टेस्ट में स्टीव स्मिथ का LBW से बचना, इन सब पर खूब बहस हुई।
दक्षिण अफ्रीका दौरे के केपटाउन टेस्ट (जनवरी 2022) में भी भारत एक DRS विवाद में फंसा। डीन एल्गर ने रविचंद्रन अश्विन की गेंद पर LBW का फैसला रिव्यू से पलटवा लिया, जबकि लग रहा था कि गेंद लेग स्टंप पर लगती। बॉल ट्रैकिंग में गेंद स्टंप्स के ऊपर से निकलती दिखी। नाराज भारतीय खिलाड़ियों ने स्टंप माइक पर ब्रॉडकास्टर के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की।
कुल मिलाकर, DRS को फैसलों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए लाया गया था। विवादों के बावजूद यह खेल में निष्पक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
अंग्रेजी में पढ़ें: What is DRS in cricket?


